तेरे मेरे दरमियाँ जो है उसे रिश्ते का नाम न दे इस सफ़र को चलने दे कोई अंजाम न दे जितना सुलझाता हूँ उलझती है रिश्तों की डोर क़सूर तेरा और मेरा, बेवज़ह धागे को इल्जाम न दे मेरे छूने से टूट के बिखर गयी वो मोहब्बत, किसी को ऐसा इनाम न दे इतना ऊंचा उठ गया कि उसे जमीन नहीं दिखती अपनो से दूर हो जाऊँ मौला ऐसा मुकाम न दे महकता था उसके आने से कभी घर-आँगन जुस्तजू न रही अब, ऐ हवा उसका पैगाम न दे आँसुओ का हाला पिया उम्र भर बस कर साक़ी अब और जाम न दे जुस्तजू मुझे उसकी, उसकी ही तलाश है मुझे ख़ुदा के घर ले चल पता उसका इमाम न दे ठोकरों ने पाला, भूख ने संभाला, तीरगी बनी मुर्शिद दुश्वारियों की है लत मुझको अब मुझे आराम न दे तेरे हिसाब-किताब से थक गया हूँ ज़िंदगी अब निज़ात दे मुझे और अब काम न दे लो मर गया एक और मजलूम तुम्हारे शहर में कैसे है लोग ग़रीब को पसीनें का दाम न दे तुझ से बावस्ता मेरे महो-अंजुम बिन तेरे गुजारूं ऐसी शाम न दे
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Showing posts from June, 2017
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# mrtyr # honour # vengeance # politics # pain # chhatisgarh # sukma शादीदों को एक विनम्र श्रद्धांजलि निंदा,भर्त्सना, आलोचना बंद इनका व्यापार करो प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही अब तो कुछ सरकार करो अब तो कुछ सरकार करो रक्त का उत्तर रक्त हो मत फूलो का हार करो जनता तुमसे कह रही बंद राजनीती का बाज़ार करो अब तो कुछ सरकार करो शहादत पे रोटियाँ सेक रहे उनको तुम लाचार करो अब तो कुछ प्रतिकार करो घर में घुसकर वार करो अब तो कुछ सरकार करो नहीं चाहिए सांत्वना ना शब्दो की भरमार करो लहू मांगती धरती अब सीने में हुँकार भरो अब तो कुछ सरकार करो मृत्युगीत गूँजे शत्रु ह्रदय में वीरो ऐसे तुम संहार करो माटी के लाल तुम क्यों चुप हो वे पशु,उनसे पशुवत व्यवहार करो अब तो कुछ सरकार करो शहीद सजे चिताओ पर उनको अंतिम विदाई दो सौगन्ध तुमको इस अग्नि की शत्रुदल में हाहाकार करो अब तो कुछ सरकार करो बलिदान व्यर्थ न जाने पाये स्वयँ को तुम तैयार करो फूँक दो बिगुल युद्ध का काँप उठे जंगल ऐसी ललकार करो अब तो कुछ सरकार करो ...