तेरे मेरे दरमियाँ जो है उसे रिश्ते का नाम न दे
इस सफ़र को चलने दे कोई अंजाम न दे

जितना सुलझाता हूँ उलझती है रिश्तों की डोर
क़सूर तेरा और मेरा, बेवज़ह धागे को इल्जाम न दे

मेरे छूने से टूट के बिखर गयी वो
मोहब्बत, किसी को ऐसा इनाम न दे

इतना ऊंचा उठ गया कि उसे जमीन नहीं दिखती
अपनो से दूर हो जाऊँ मौला ऐसा मुकाम न दे

महकता था उसके आने से कभी घर-आँगन
जुस्तजू न रही अब, ऐ हवा उसका पैगाम न दे

आँसुओ का हाला पिया उम्र भर
बस कर साक़ी अब और जाम न दे

जुस्तजू मुझे उसकी, उसकी ही तलाश है
मुझे ख़ुदा के घर ले चल पता उसका इमाम न दे

ठोकरों ने पाला, भूख ने संभाला, तीरगी बनी मुर्शिद
दुश्वारियों की है लत मुझको अब मुझे आराम न दे

तेरे हिसाब-किताब से थक गया हूँ ज़िंदगी
अब निज़ात दे मुझे और अब काम न दे

लो मर गया एक और मजलूम तुम्हारे शहर में
कैसे है लोग ग़रीब को पसीनें का दाम न दे

तुझ से बावस्ता मेरे महो-अंजुम
बिन तेरे गुजारूं ऐसी शाम न दे

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